काश! मैं वृक्ष होता - Kaash! Mai Vriksh Hota | रुदन करता पेड़ - Rudan Karta Ped काश! मैं वृक्ष होता रंग-बिरंगे पुष्प खिलाता मनभावन खुशबू फैलाता। बिन मांगे ही फल देता कुछ न अपने लिए बचाता। परोपकार में होता दक्ष काश! मैं बन जाऊँ वृक्ष। प्रेम-सुधा बरसात सब पर चाहे खग हो , चाहे चौपाया। नव जीवन भर देती सब में मेरी ठंडी, शीतल छाया। करता न्याय होकर निष्पक्ष काश! मैं बन जाऊँ वृक्ष। रुदन करता पेड़ मैंने पेड़ को रोते देखा उसका सब कुछ खोते देखा। भुजा समान उसकी डाली को उससे अलग होते देखा। सिसकी हर पत्ता भरता है मुँह से आह! भी न करता है। जड़ों से आँसू बहते हैं दुख की कहानी कहते हैं। अब तो छोड़ो हमें सताना अब न मिलेगा मौसम सुहाना। अपने बच्चों के लिए मैंने मानव को दुख का बीज बोते देखा। हाँ! मैंने पेड़ को रोते देखा उसका सब कुछ खोते देखा । डॉ. मुल्ला आदम अली https://www.drmullaadamali.com तिरुपति - आंध्र प्रदेश #GUEST_POST
|| महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता || || Mahabharata Poem On Arjuna || तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | कुरुक्षेत्र का महासमर एक पल में तभी सजा डाला, पांचजन्य उठा कृष्ण ने मुख से लगा बजा डाला | हुआ शंखनाद जैसे ही सब का गर्जन शुरु हुआ, रक्त बिखरना हुआ शुरु और सबका मर्दन शुरु हुआ | कहा कृष्ण ने उठ पार्थ और एक आँख को मीच जड़ा, गाण्डिव पर रख बाणों को प्रत्यंचा को खींच जड़ा | आज दिखा दे रणभूमि में योद्धा की तासीर यहाँ, इस धरती पर कोई नहीं, अर्जुन के जैसा वीर यहाँ || सुनी बात माधव की तो अर्जुन का चेहरा उतर गया, ...